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गड़वार में अज्ञात कारणों से दो रिहायशी झोपड़ियों में लगी आग,गृहस्थी का सामान जलकर राख मोंठ–नगर पंचायत कार्यालय परिसर में सोमवार को सफाई कर्मचारियों ने पूरे उत्साह और भाईचारे के साथ होली का पर्व मनाया। होली की फाग से गूंज रहे गांव, पुरानी परंपराएं आज भी जीवित। हर सोमवार शीतला माता मंदिर पांडौरी में आयोजित हो रहा भंडारादूर-दराज़ से उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़। जमीनी विवाद में दो पक्षों में खूनी संघर्ष, आठ लोग घायल मोंठ–तहसील क्षेत्र के ग्राम टोड़ी स्थित प्रसिद्ध कपिल मुनि आश्रम सेवड़ा पहाड़ पर प्रतिवर्ष होली की दोज के अवसर पर लगने वाले पारंपरिक मेले की तैयारियां लगभग पूर्ण हो चुकी हैं।
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होली की फाग से गूंज रहे गांव, पुरानी परंपराएं आज भी जीवित।

होली की फाग से गूंज रहे गांव, पुरानी परंपराएं आज भी जीवित।

मोंठ: होली का पर्व नजदीक आते ही गांवों और कस्बों में उत्साह का माहौल दिखाई देने लगा है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में होरी और फाग गाने की पुरानी परंपरा आज भी लोगों को आनंद और उमंग से भर देती है। ढोलक, मंजीरे और झांझ की धुन पर जब फाग गाई जाती है तो पूरा वातावरण मस्ती से सराबोर हो उठता है। बुजुर्गों के साथ-साथ युवा भी इन पारंपरिक गीतों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, जिससे पुरानी संस्कृति आज भी जीवित दिखाई देती है।
होली को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के साथ लोग अपने अंदर की बुराइयों, ईर्ष्या और द्वेष को समाप्त करने का संकल्प लेते हैं। अगले दिन रंगों की होली खेलकर लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं और आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं। यही कारण है कि होली को सामाजिक सौहार्द और एकता का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है।
ग्रामीण इलाकों में आज भी कई जगह पारंपरिक तरीके से होली मनाई जाती है। शाम होते ही चौपालों पर लोग इकट्ठा होकर फाग गाते हैं और एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर शुभकामनाएं देते हैं। महिलाएं भी समूह बनाकर पारंपरिक गीत गाती हैं, जिससे माहौल और भी आनंदमय हो जाता है।
बदलते समय में आधुनिकता का प्रभाव जरूर पड़ा है, लेकिन इसके बावजूद होली की पुरानी परंपराएं आज भी जीवित हैं। यह पर्व हमें प्रेम, सद्भाव और आपसी एकता का संदेश देता है। जरूरत है कि हम इन परंपराओं को जन्मदिन संजोकर रखें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं, ताकि हमारी संस्कृति और त्योहारों की असली पहचान बनी रहे।

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