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लोक संस्कृति व कला से परिपूर्ण दिवारी नृत्य देखने जुटे लोग


कोंच। विंध्य पर्वत मालाओं से घिरे बुंदेलखंड का यह अंचल वैसे तो तमाम अभावों और बदहाली के कारण जाना जाता है। इस बदहाल अंचल में ऐसी कई प्राचीन परम्परा और और लोक संस्कृति व कला है जो इस अंचल को एक अलग पहचान दिलाती है लेकिन बढ़ती पाश्चात्य सभ्यता के गर्त में धीरे-धीरे ये परम्पराएं समाप्त होती जा रहीं हैं।ऐसी ही परम्परा है दिवारी गीत व नृत्य की। महापर्व दीपावली के अगले रोज परबा के दिन दिवारी नृत्य करने वाले मोनिया पहले के समय प्रायः हर गली और नुक्कड़ पर नृत्य करते हुए देखे जाते थे लेकिन वर्तमान समय में यह सब अब सीमित होता जा रहा है। दिवारी गीत व नृत्य मूलतः चरागाही संस्कृति के गीत हैं, यही कारण है की इन गीतों में जीवन का यथार्थ मिलता है। फिर चाहे वह सामाजिकता हो या धार्मिकता अथवा श्रृंगार और जीवन का दर्शन। दिवारी गीत वह गीत हैं जिनमें सिर्फ जीवन की वास्तविकता के रंग हैं, बनावटी दुनिया से दूर सिर्फ चरागाही संस्कृति का प्रतिबिम्ब। ओज से परिपूर्ण इन गीतों में विविध रसों की अभिव्यक्ति मिलती है। दिवारी नृत्य के तहत मोनिया मौन व्रत रखकर गाँव गाँव-नगर नगर में घूमते हैं। दीपावली पूजन के उपरांत मध्य रात्रि में मोनिया व्रत आरंभ हो जाता है।मोनिया तालाब/नदी में स्नान कर सज-धज कर मौन व्रत रखते हैं इसी कारण इन्हें मोनिया कहा जाता है।द्वापर युग से यह परम्परा चली आ रही है। इसमें विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौन रहने का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत में मांस व मदिरा सहित अन्य सभी दुर्व्यसनों का सेवन वर्जित रहता है। 12 वर्ष व्रत रखने के उपरांत 13वें वर्ष में मथुरा व वृंदावन जाकर यमुना नदी के तट पर पूजन कर ही व्रत का उद्यापन किया जाता है। वहीं इस वर्ष भी नगर के गांधीनगर निवासी मोनिया कलू कुशवाहा, बलू कुशवाहा, बल्ले चौहान, बिहारी चौहान, शशि,प्रभुदयाल कुशवाहा, पप्पू कुशवाहा आदि ने नरसिंह मंदिर चंदकुआँ के समीप स्थित प्राचीन कारसदेव बाबा के स्थान से दिवारी गीत गाकर नृत्य किया जिसके बाद भूतेश्वर मंदिर सहित नगर के अनेक मंदिरों पर दिवारी नृत्य किया। दिवारी गीत सुनने व नृत्य देखने के लिए लोगों खासकर बूढ़े बुजुर्गों की खासी भीड़ जमी रही।

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