



मोंठ की ऐतिहासिक साप्ताहिक हाट फिर से शुरू करने की उठी मांग।
मोंठ: कस्बे में कई दशकों पूर्व प्रत्येक बुधवार को लगने वाली साप्ताहिक हाट क्षेत्र की पहचान मानी जाती थी। यह हाट न केवल स्थानीय लोगों बल्कि दूर-दराज के ग्रामीण अंचलों के लिए भी खरीदारी का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। हाट के दिन मोंठ में रौनक देखते ही बनती थी। सुबह से ही आसपास के गांवों के साथ-साथ अन्य जिलों और मध्य प्रदेश तक से लोग यहां पहुंचते थे। कपड़े, अनाज, घरेलू सामान, बर्तन, कृषि उपकरण, मिठाई, खिलौने और हस्तनिर्मित वस्तुओं की भरपूर बिक्री होती थी।
मोंठ की हाट की प्रसिद्धि इतनी थी कि व्यापारी महीनों पहले से तैयारी कर यहां दुकानें लगाने आते थे। खास बात यह थी कि हाट के साथ पशु बाजार भी लगता था, जहां गाय, बैल, भैंस, बकरी सहित अन्य पशुओं की खरीद-फरोख्त होती थी। इससे किसानों और पशुपालकों को बड़ा लाभ मिलता था। यह हाट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती थी और हजारों परिवारों की आजीविका इससे जुड़ी हुई थी।
समय के साथ शहरीकरण, स्थायी दुकानों की बढ़ोतरी और प्रशासनिक उदासीनता के चलते यह ऐतिहासिक हाट धीरे-धीरे बंद हो गई। हाट बंद होने से छोटे व्यापारियों, फेरीवालों और किसानों को काफी नुकसान हुआ। आज भी बुजुर्ग मोंठ की उस साप्ताहिक हाट को याद कर उसकी उपयोगिता और रौनक की चर्चा करते हैं।
अब क्षेत्रवासियों ने एक बार फिर साप्ताहिक हाट को पुनः शुरू करने की मांग उठाई है। लोगों का कहना है कि हाट लगने से स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिलेगा, युवाओं को रोजगार मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। नागरिकों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बुधवार की परंपरागत हाट को पुनर्जीवित करने की मांग की है, ताकि मोंठ की पुरानी पहचान और व्यापारिक गरिमा वापस लौट आए।
मोंठ की साप्ताहिक हाट पर बुजुर्गों के वर्जन।
- चंद्रप्रकाश पोद्दार बुजुर्ग व्यापारी (78 वर्ष):
“बुधवार की हाट मोंठ की जान हुआ करती थी। उस दिन कस्बे में पैर रखने की जगह नहीं होती थी। गांव-गांव से लोग ट्रैक्टर और बैलगाड़ी से खरीदारी करने आते थे। अनाज से लेकर कपड़े और पशुओं तक की खुलकर बिक्री होती थी। हाट बंद होने से गरीब और छोटे व्यापारियों का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। - बीरे लहारिया बुजुर्ग व्यापारी (76 वर्ष):
“मोंठ की हाट की पहचान दूर-दूर तक थी। मध्य प्रदेश से भी व्यापारी और खरीदार आते थे। पशु बाजार बहुत प्रसिद्ध था, किसान अच्छे दाम पाते थे। हाट केवल बाजार नहीं, आपसी मेल-मिलाप का भी बड़ा केंद्र थी, जो अब खत्म हो गया है। - मैथिली शरण रावत (85 वर्ष):
“हमने अपनी जवानी में मोंठ की हाट की रौनक देखी है। एक ही दिन में पूरे हफ्ते की खरीदारी हो जाती थी। इससे कस्बे के दुकानदारों की भी अच्छी आमदनी होती थी। अगर फिर से हाट लगे तो क्षेत्र का व्यापार जरूर फले-फूलेगा। - आशाराम कोरी ग्राम लावन किसान (75 वर्ष):
“बुधवार की हाट गरीबों के लिए बड़ा सहारा थी। फेरीवाले, कारीगर और किसान सभी को रोजगार मिलता था। आज महंगाई में लोगों को सस्ता सामान नहीं मिल पाता। हाट फिर से शुरू हो जाए तो लोगों को राहत मिलेगी और मोंठ की पुरानी पहचान लौटेगी।”
