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दीपावली की चमक में धूमिल होती पत्रकारिता :— “लिफाफा संस्कृति” का काला सच


🖊️ विशेष सम्पादकीय लेख — अरविन्द दुबे

दीपावली रोशनी का पर्व है — यह अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। परन्तु आज जब हम पत्रकारिता की गलियों में दीपावली की रौनक देखते हैं, तो एक अजीब अंधेरा पसरा दिखाई देता है — यह अंधेरा “लिफाफा संस्कृति” का है।

पत्रकारिता का उद्देश्य कभी समाज को दिशा देना, सत्ताओं को आईना दिखाना और जनता की आवाज़ बनना हुआ करता था। लेकिन अब दीपावली जैसे पवित्र पर्व के अवसर पर, कई पत्रकारों के हाथों में कलम नहीं, लिफाफे चमकते दिखाई देते हैं। अधिकारी, नेता और व्यापारी “शुभकामनाओं” के नाम पर नोटों से भरे लिफाफे देते हैं, और अनेक पत्रकार बिना संकोच उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। यही पत्रकारिता की सबसे घातक बीमारी बन चुकी है — लिफाफा संस्कृति।

यह केवल एक “उपहार” नहीं, बल्कि एक सौदा है — खबरों की आत्मा का सौदा। इसके तहत पत्रकारों को पैसे या उपहार दिए जाते हैं ताकि वे सत्ता या प्रभावशाली वर्ग के पक्ष में खबरें लिखें, या सच्चाई को दबा दें। परिणामस्वरूप, सच्चाई की लौ बुझने लगती है, भ्रष्टाचार को बल मिलता है, और जनता भ्रम के अंधेरे में भटकती रहती है।

पत्रकारिता की आत्मा पर प्रहार

कभी पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तंभ कहा गया था — वह स्तंभ जो न झुके, न बिके, न डरे। लेकिन आज यह स्तंभ दरक रहा है।
कई पत्रकार सुबह जब घर से निकलते हैं, तो उनके मन में खबर नहीं, “आज कितना खर्चा-पानी निकलेगा” जैसी सोच होती है। कुछ लोग खबरों की कवरेज या प्रकाशन के लिए बाकायदा दर तय कर लेते हैं — ₹500 से ₹5000 तक। कहीं फोटो छपवाने का सौदा, कहीं खबर रोकने का मोल।
इस प्रवृत्ति ने पत्रकारिता की जड़ों को खोखला कर दिया है।

अब तो यह स्थिति आ चुकी है कि समाचार संस्थानों में भी “राजनीतिक विज्ञापन”, “पेड न्यूज़” और “स्पॉन्सर्ड रिपोर्टिंग” आम बात हो गई है। खबरों की भाषा से लेकर शीर्षक तक, सब कुछ पैसे की ताकत तय करती है। यह वह दौर है जिसमें कलम की स्याही पर बाज़ार का रंग चढ़ चुका है।

कहाँ गए वे आदर्श?

क्या यह वही पत्रकारिता है जिसकी मशाल गणेश शंकर विद्यार्थी, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, मक्खनलाल चतुर्वेदी और रामनाथ गोयनका जैसे लोगों ने जलाई थी?

गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने अख़बार “प्रताप” के माध्यम से अन्याय और शोषण के खिलाफ कलम चलाई। उन्होंने कहा था —

“पत्रकार का धर्म है सत्ता के विरोध में जनता की आवाज़ बनना, न कि सत्ता का चाटुकार बनना।”
उन्होंने पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, बल्कि बलिदान का माध्यम बनाया। 1931 में कानपुर दंगों में दंगाइयों को रोकते हुए उन्होंने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए।

मक्खनलाल चतुर्वेदी, ‘कर्मवीर’ के संपादक, ने लिखा —

“पत्रकारिता वह दीप है जो अंधकार से लड़ता है, चाहे उसकी लौ ही क्यों न जल जाए।”
उनकी कविताएँ और लेख जनता में जागरूकता की ज्वाला बन गए।

बाल गंगाधर तिलक ने अपने अख़बार “केसरी” से ब्रिटिश शासन के खिलाफ बिगुल फूंका। उन्होंने कहा था —

“पत्रकारिता जनसेवा का सबसे सशक्त माध्यम है, न कि सत्ता का उपकरण।”

लाला लाजपत राय ने “द ट्रिब्यून” के मंच से लिखा —

“सत्य की सेवा करना पत्रकार का परम धर्म है, चाहे उसके बदले में पत्थर ही क्यों न मिलें।”

इन्हीं महान आत्माओं ने पत्रकारिता को राष्ट्र निर्माण का औजार बनाया था। उन्होंने न तो सत्ता से भय खाया, न पैसे के आगे सिर झुकाया। उन्होंने पत्रकारिता को आदर्श, नैतिकता और साहस का प्रतीक बनाया।

आज का परिदृश्य : खबर या व्यापार?

आज पत्रकारिता ने रूप बदल लिया है। अब यह सेवा नहीं, व्यवसाय बन चुकी है।
समाचार चैनलों पर चीखती बहसें, झूठे सर्वे, सनसनी फैलाने वाले हेडलाइन और विज्ञापनों से लदी खबरें — यही आज का मीडिया है।
पत्रकारिता जो कभी “जन की बात सत्ता तक” पहुंचाती थी, अब “सत्ता की बात जनता तक” पहुंचाने का ठेका ले चुकी है।

सोशल मीडिया के युग में भी सच्चाई की जगह ‘ट्रेंडिंग’ ने ले ली है। खबरों को पहले वायरल बनाया जाता है, फिर सत्यापन किया जाता है। यह उलटी पत्रकारिता का युग है, जहां नैतिकता पीछे छूट चुकी है।

सच्ची पत्रकारिता की राह

लेकिन इस अंधकार में भी कुछ दीये अब भी जल रहे हैं। देश में आज भी ऐसे पत्रकार हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी सच्चाई की राह पर चलते हैं। जो हर लिफाफे को ठुकराकर अपनी कलम को ईमानदार रखते हैं।
ऐसे लोगों ने यह साबित किया है कि सच्ची पत्रकारिता अब भी जीवित है — भले ही मुश्किलों में हो।

दीपावली का यह पर्व हमें याद दिलाता है कि असली रोशनी भीतर से आती है। पत्रकार के लिए यह भीतर की रोशनी ईमानदारी है। जब तक ईमानदारी की लौ जलती रहेगी, तब तक खबरें बिक नहीं पाएंगी।

आवश्यक है आत्ममंथन

अब समय आ गया है कि पत्रकार स्वयं से प्रश्न करें —
क्या हम पत्रकार हैं या प्रचारक?
क्या हम समाज के प्रहरी हैं या सत्ता के दलाल?
क्या हमारी कलम सच्चाई के लिए चलती है या नोटों की गंध पर थम जाती है?

जब तक इन सवालों का ईमानदार उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक दीपावली की रोशनी भी पत्रकारिता के अंधकार को मिटा नहीं पाएगी।

समापन : प्रकाश भीतर से हो

दीपावली का संदेश यही है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक दीप पर्याप्त है उसे मिटाने के लिए।
अगर हर पत्रकार अपने भीतर सत्य का दीप जलाए, तो लिफाफा संस्कृति का अंधेरा स्वयं मिट जाएगा।

आइए, इस दीपावली हम प्रण लें —
कि हम लिफाफों की जगह सच्चाई उठाएँगे,
हम उपहारों की जगह ईमानदारी का दीप जलाएँगे,
और हम उस पत्रकारिता को पुनर्जीवित करेंगे
जिसके लिए गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महापुरुषों ने प्राणों की आहुति दी थी।

क्योंकि पत्रकारिता तभी सार्थक है,
जब वह बिकाऊ नहीं — टिकाऊ हो।

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